TRP क्या होती है?
टीवी चैनल अक्सर दावा करते हैं कि वे “नंबर 1” हैं। यह दावा TRP के आधार पर होता है। TRP यानी टेलीविज़न रेटिंग पॉइंट, एक तरह से टीवी चैनलों की “मार्कशीट”। इससे पता चलता है कि किस चैनल या प्रोग्राम को कितने लोगों ने और कितनी देर तक देखा।
कौन जारी करता है?
भारत में टीवी रेटिंग BARC (ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल) जारी करती है। यह 2015 से रेटिंग जारी कर रही है और देश की एकमात्र रेटिंग एजेंसी है। यह सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के नियमों के तहत काम करती है और आमतौर पर हर हफ़्ते रिपोर्ट जारी करती है।
TRP कैसे तय होती है?
हर चैनल की आवाज़ में एक न सुनाई देने वाला कोड, यानी “वॉटरमार्क” डाला जाता है। देश के करीब 71,000 चुने हुए घरों में टीवी से एक मीटर जुड़ा होता है, जिसे BAR-O-meter कहते हैं। यह मीटर वॉटरमार्क पहचानकर बताता है कि टीवी पर कौन सा चैनल चल रहा है। परिवार का हर सदस्य रिमोट पर अपना अलग बटन दबाकर बताता है कि वह टीवी देख रहा है। इन घरों के डेटा से पूरे देश के दर्शकों का अनुमान लगाकर रेटिंग बनाई जाती है।
चैनल को क्या फ़ायदा?
जिस चैनल की TRP ज़्यादा होती है, उसे विज्ञापन के ऊँचे दाम मिलते हैं और बड़े ब्रांड उसकी ओर आते हैं। TRP से चैनल यह भी तय करते हैं कि कौन सा शो चलाना है और कौन सा बंद करना है। “नंबर 1 चैनल” की पहचान दर्शकों का भरोसा भी बढ़ाती है।
विवाद भी
2020 में मुंबई पुलिस ने “TRP घोटाले” का आरोप लगाया था कि मीटर वाले कुछ घरों को पैसे देकर कुछ चैनल चलवाए गए। इस मामले के बाद रेटिंग व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठे।
2026 की नई नीति
सरकार की नई टीवी रेटिंग नीति 2026 के तहत मीटर वाले घरों की संख्या 50,000 से बढ़ाकर 80,000 की जाएगी। स्मार्ट टीवी और OTT पर देखे गए कार्यक्रम भी गिने जाएँगे। टीवी चालू होते ही अपने-आप खुलने वाले चैनल, यानी “लैंडिंग पेज” के व्यू अब नहीं गिने जाएँगे। जुलाई 2026 से रेटिंग जारी होना रुका हुआ है, क्योंकि नई नीति के तहत BARC का पंजीकरण अभी बाकी है (अक्टूबर 2026 तक)।
दर्शक के लिए सबक
ज़्यादा TRP का मतलब हमेशा अच्छी पत्रकारिता नहीं होता। सनसनीख़ेज़ ख़बरें अक्सर ज़्यादा देखी जाती हैं, इसलिए चैनल चुनते समय उसकी विश्वसनीयता भी देखें।

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