आज़ाद भारत के पहले आम चुनाव
आज़ादी के समय दुनिया के कई लोगों को शक था कि इतनी गरीबी और कम साक्षरता वाले देश में लोकतंत्र चल पाएगा। 1951-52 के पहले आम चुनाव ने इस शक को गलत साबित कर दिया। यह उस समय दुनिया का सबसे बड़ा चुनाव था।
आँकड़ों में पहला चुनाव
इस चुनाव में करीब 17.3 करोड़ मतदाता थे। लोकसभा की 489 सीटों के लिए 53 राजनीतिक दलों के 1,949 उम्मीदवार मैदान में थे। देश भर में करीब 1.96 लाख मतदान केंद्र बनाए गए। चुनाव 68 चरणों में हुआ और लगभग 4 महीने चला, अक्टूबर 1951 से फ़रवरी 1952 तक।
क्यों था यह ऐतिहासिक?
भारत ने पहले ही चुनाव से 21 साल से ऊपर के हर नागरिक को वोट का अधिकार दिया, चाहे वह अमीर हो या गरीब, पुरुष हो या महिला। कई पश्चिमी देशों में भी महिलाओं को यह अधिकार लंबे संघर्ष के बाद मिला था। उस समय देश की साक्षरता करीब 18 प्रतिशत ही थी, इसलिए हर उम्मीदवार के लिए अलग रंग की मतपेटी और चुनाव चिह्न रखे गए, ताकि अनपढ़ मतदाता भी आसानी से वोट दे सकें।
नेहरू और सुकुमार सेन
नेहरू ने इस चुनाव को लोकतंत्र की नींव माना और देश भर में घूमकर प्रचार किया। देश के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन ने इस विशाल काम को ज़मीन पर उतारा। मतदाता सूची बनाने, कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने और दूर-दराज़ के इलाकों तक मतपेटियाँ पहुँचाने का काम बिना किसी पुराने अनुभव के किया गया।
रोचक तथ्य
पहला वोट 25 अक्टूबर 1951 को हिमाचल प्रदेश की चीनी तहसील में डाला गया, क्योंकि वहाँ सर्दियों में बर्फ़ से रास्ते बंद हो जाते थे। महिलाओं के लिए अलग से 27,527 मतदान केंद्र बनाए गए। करीब 28 लाख महिलाओं के नाम मतदाता सूची से हटाने पड़े, क्योंकि उन्होंने अपना नाम न बताकर खुद को “फलाँ की पत्नी” या “फलाँ की माँ” लिखवाया था।
नतीजे
कांग्रेस ने 489 में से 364 सीटें जीतीं और नेहरू जनता द्वारा चुने गए देश के पहले प्रधानमंत्री बने। इस चुनाव ने साबित किया कि आम भारतीय मतदाता अपनी सरकार खुद चुन सकता है, और यही परंपरा आज तक चल रही है।

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