नेहरू की विदेश नीति
आज़ादी के समय दुनिया दो गुटों में बँटी थी: एक तरफ़ अमेरिका का खेमा, दूसरी तरफ़ सोवियत संघ का। नए आज़ाद हुए भारत के सामने सवाल था कि वह किसके साथ जाए। प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री के रूप में नेहरू ने एक तीसरा रास्ता चुना।
गुटनिरपेक्षता
नेहरू की विदेश नीति का मूल मंत्र था किसी गुट में शामिल न होना। भारत अमेरिका और सोवियत संघ, दोनों में से किसी के खेमे में नहीं गया और फ़ैसले अपने देशहित में खुद लिए। इसका मतलब तटस्थ रहना नहीं, बल्कि हर मुद्दे पर अपनी स्वतंत्र राय रखना था।
पंचशील
1954 में भारत और चीन ने शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धांत तय किए, जिन्हें पंचशील कहा गया: एक-दूसरे की सीमा और संप्रभुता का सम्मान, एक-दूसरे पर आक्रमण न करना, अंदरूनी मामलों में दखल न देना, बराबरी और आपसी लाभ, और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व।
उपनिवेशवाद का विरोध
भारत ने एशिया और अफ्रीका के गुलाम देशों की आज़ादी और दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद के ख़िलाफ़ संयुक्त राष्ट्र समेत हर मंच पर खुलकर आवाज़ उठाई।
बड़े पड़ाव
1947 में दिल्ली में एशियाई संबंध सम्मेलन हुआ, जिसने एशिया के देशों को एक मंच दिया। 1949 में भारत ने गणराज्य बनकर भी राष्ट्रमंडल में रहने का रास्ता निकाला। कोरिया युद्ध के बाद युद्धबंदियों की वापसी के लिए बने आयोग की अध्यक्षता भारत ने की। 1955 में इंडोनेशिया के बांडुंग में हुए एशियाई-अफ्रीकी सम्मेलन में भारत की अहम भूमिका रही। 1956 के स्वेज़ संकट के बाद गाज़ा में संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में भारतीय सैनिक भेजे गए। 1961 में यूगोस्लाविया के बेलग्रेड में मार्शल टीटो और मिस्र के नासिर के साथ मिलकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना हुई। इसी साल गोवा, दमन और दीव को पुर्तगाली शासन से मुक्त कराया गया।
आलोचना और सबक
नेहरू की विदेश नीति की आलोचना भी होती है। 1962 के चीन युद्ध में हार ने पंचशील पर भरोसे और देश की रक्षा तैयारी पर गंभीर सवाल खड़े किए। 1948 में कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र ले जाने के फ़ैसले पर भी आज तक बहस होती है।
आज के समय में
गुटनिरपेक्षता का विचार आज भी भारत की “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति में दिखता है, जिसमें भारत अलग-अलग देशों से अपने हितों के हिसाब से रिश्ते रखता है।

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