FCRA बिल 2026 क्या है?

FCRA बिल 2026 क्या है?

FCRA यानी विदेशी अंशदान विनियमन कानून (Foreign Contribution Regulation Act)। इसके तहत कोई भी NGO, ट्रस्ट या संस्था विदेश से चंदा तभी ले सकती है, जब उसके पास गृह मंत्रालय का FCRA रजिस्ट्रेशन हो। 2026 में इस कानून में एक नया संशोधन बिल लाया गया है, जिस पर बहस चल रही है।

कानून का सफ़र

पहला FCRA कानून 1976 में आपातकाल के दौरान बना। 2010 में पुराने कानून की जगह नया FCRA कानून आया। 2020 में इसमें कड़े नियम जोड़े गए: प्रशासनिक खर्च की सीमा 20 प्रतिशत कर दी गई और विदेशी चंदा केवल SBI की नई दिल्ली शाखा के ख़ास खाते में लेना ज़रूरी हुआ। अब 2026 में नया संशोधन बिल लाया गया है।

कुछ आँकड़े

2024-25 में देश में करीब 16,200 संस्थाएँ FCRA के तहत सक्रिय थीं, और उन्हें ₹22,963 करोड़ का विदेशी चंदा मिला। पिछले 10 सालों में करीब 20,000 संस्थाओं के रजिस्ट्रेशन रद्द हुए हैं।

2026 बिल में क्या नया है?

अगर किसी संस्था का रजिस्ट्रेशन रद्द हो जाए या रिन्यू न हो, तो विदेशी चंदे से बनी उसकी संपत्ति एक “नामित प्राधिकरण” के पास चली जाएगी। दोबारा रजिस्ट्रेशन न मिलने पर यह संपत्ति स्थायी रूप से सरकार की हो जाएगी, और बेचने पर पैसा भारत की संचित निधि में जाएगा। धार्मिक स्थलों का धार्मिक स्वरूप बना रहेगा। अधिकतम जेल की सज़ा 5 साल से घटाकर 1 साल की गई है। राज्य की एजेंसियों को जाँच से पहले केंद्र सरकार की मंज़ूरी लेनी होगी। समय पर रिन्यू न होने पर रजिस्ट्रेशन अपने-आप ख़त्म माना जाएगा। आदेश के ख़िलाफ़ 90 दिन में पुनरीक्षण और ज़िला जज के यहाँ अपील का प्रावधान है।

सरकार का तर्क

सरकार का कहना है कि इससे विदेशी पैसे के इस्तेमाल में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी, संपत्ति के गलत इस्तेमाल पर रोक लगेगी, छोटी गलतियों पर कम सज़ा होगी और एक ही मामले में कई जाँचों से राहत मिलेगी।

आलोचकों की चिंता

आलोचकों का कहना है कि इससे NGO, चैरिटी और धार्मिक-शैक्षिक संस्थाओं की आज़ादी पर असर पड़ेगा। संपत्ति लेने से पहले सुनवाई की व्यवस्था पर सवाल उठे हैं, और यह भी कहा गया है कि इससे सरकार के हाथ में ज़्यादा अधिकार आ जाएँगे। कुछ राज्यों ने ज़्यादा सलाह-मशविरे की माँग की है।

अभी स्थिति

यह बिल 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश हुआ और 12 अगस्त 2026 को संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेजा गया। अभी यह समिति के विचाराधीन है और कानून नहीं बना है।

स्रोत: गृह मंत्रालय / PIB फ़ैक्टशीट, PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च (2026)।

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