जब बांध को “मंदिर” कहा गया: भाखड़ा
आज़ादी के बाद देश के सामने दो बड़ी समस्याएँ थीं: खेतों के लिए पानी नहीं था और गाँवों में बिजली नहीं थी। बँटवारे के बाद पंजाब की कई नहरें पाकिस्तान में चली गई थीं, और अनाज के लिए देश दूसरे देशों पर निर्भर था। इसी चुनौती का जवाब बना भाखड़ा बांध।
पहाड़ काटकर बना बांध
हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर ज़िले में सतलुज नदी पर 1948 में भाखड़ा बांध का काम शुरू हुआ। हज़ारों मज़दूरों और इंजीनियरों ने करीब 15 साल तक कठिन पहाड़ों के बीच काम किया। अमेरिकी इंजीनियर हार्वे स्लोकम इस परियोजना के मुख्य इंजीनियर थे। 1963 में यह बांध पूरा हुआ।
जब बांध को “मंदिर” कहा गया
22 अक्टूबर 1963 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने यह बांध देश को समर्पित किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि मेहनत से बना यह बांध पूजा के योग्य है, चाहे इसे मंदिर कहें, गुरुद्वारा कहें या मस्जिद। नेहरू ऐसी बड़ी परियोजनाओं को “आधुनिक भारत के मंदिर” कहते थे।
आँकड़ों में भाखड़ा
भाखड़ा बांध 226 मीटर ऊँचा है और यह देश के सबसे ऊँचे कंक्रीट ग्रेविटी बांधों में से एक है। इसके बिजलीघरों की क्षमता 1,325 मेगावाट है। बांध के पीछे बनी विशाल झील को गोबिंद सागर कहा जाता है, जिसका नाम गुरु गोबिंद सिंह जी के नाम पर रखा गया।
खेतों तक पानी
भाखड़ा का पानी नहरों के ज़रिए पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के लाखों हेक्टेयर खेतों तक पहुँचता है। इस बांध ने 1960 के दशक की हरित क्रांति की ज़मीन तैयार की, जिसके बाद पंजाब और हरियाणा देश के अन्न भंडार कहलाए। बांध से बनी बिजली ने कारखानों और गाँवों को रोशन किया, और बाढ़ पर भी काबू पाया गया।
दूसरा पहलू
इतनी बड़ी परियोजना की कीमत कुछ लोगों को चुकानी पड़ी। गोबिंद सागर झील बनने से पुराने बिलासपुर शहर समेत कई गाँव पानी में डूब गए और हज़ारों परिवारों को अपना घर छोड़ना पड़ा।
आज 60 साल से ज़्यादा बीत जाने के बाद भी भाखड़ा बांध उत्तर भारत की खेती और बिजली का एक बड़ा आधार है।

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